कलेक्टर ने दिए 'मरीज के मरने पर क्राउड मैनेजमेंट टिप्स':कहा- भीड़ को टेक्निकल ज्ञान न दें; डॉक्टर-प्रशासन-पुलिस में तालमेल बना रहे

खंडवा मेडिकल कॉलेज में फॉरेंसिक मेडिसिन एंड साइंस पर आयोजित अंतर्राष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस के दौरान 2014 बैच के आईएएस और खंडवा कलेक्टर ऋषव गुप्ता ने मेडिकल स्टूडेंट्स और डॉक्टर्स को क्राउड मैनेजमेंट पर अहम सुझाव दिए। उन्होंने कहा कि मरीज की मौत के बाद अस्पतालों में बनने वाली तनावपूर्ण स्थिति को संभालने के लिए डॉक्टरों को पहले से मानसिक और प्रशासनिक तैयारी रखनी चाहिए। मरीज की मौत पर डॉक्टरों पर लगते हैं आरोप कलेक्टर ऋषव गुप्ता ने कहा कि जब किसी मरीज की मौत होती है, तो सबसे पहले डॉक्टरों पर लापरवाही के आरोप लगते हैं। इसके बाद आक्रोशित भीड़ अस्पताल में इकट्ठा हो जाती है। इस भीड़ में एक व्यक्ति आपसे बात करता है, लेकिन वह उस समय लॉजिक से नहीं सोचता। लॉजिक नहीं, भीड़ की साइकोलॉजी समझनी होगी उन्होंने कहा कि सामने खड़ा व्यक्ति मरीज का परिजन होता है, उसके साथ भीड़ भी होती है। ऐसे में डॉक्टरों को पहले उसकी मानसिक स्थिति को समझना पड़ेगा। वह भावनात्मक रूप से टूट चुका होता है, इसलिए उसे सिर्फ तर्क से नहीं समझाया जा सकता। टेक्निकल भाषा भीड़ को और उग्र करती है कलेक्टर ने बताया कि अक्सर डॉक्टर वहीं भाषा भीड़ से बोलने लगते हैं, जो वे आपस में बोलते हैं। मेडिकल टर्म्स का इस्तेमाल करने से भीड़ को लगता है कि डॉक्टर उसे अनपढ़ समझ रहा है, जिससे गुस्सा और बढ़ जाता है। हर जगह डॉक्टर की भाषा काम नहीं करती उन्होंने कहा कि डॉक्टर भीड़ से कहते हैं कि मरीज को फलां बीमारी थी, हमने पूरा प्रयास किया, लेकिन हर जगह और हर समय टेक्निकल भाषा नहीं चलती। ऐसे समय में लोगों के इमोशन हावी होते हैं और उन्हें संवेदनशील तरीके से समझाना जरूरी होता है। पहले से रखें तैयारी, प्रशासन को समय पर सूचना दें कलेक्टर ऋषव गुप्ता ने कहा कि अगर मरीज की हालत गंभीर है और मौत की आशंका है, तो पहले से तैयारी रखें। लोकल मजिस्ट्रेट और पुलिस के नंबर डॉक्टरों के पास होने चाहिए और समय रहते उन्हें सूचना देना जरूरी है। रिकॉर्ड दिखाने नहीं, जवाब सुनने आती है भीड़ उन्होंने कहा कि डॉक्टर सोचते हैं कि रिकॉर्ड दिखाकर सब समझा देंगे, लेकिन भीड़ रिकॉर्ड देखने नहीं आती। मरीज की मौत के बाद पहला आधा या एक घंटा सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होता है, जिसमें स्थिति को संभाला जा सकता है। समन्वय न हो तो पुलिस सिर्फ डंडा दिखाती है कलेक्टर ने कहा कि अगर डॉक्टर, मजिस्ट्रेट और पुलिस के बीच तालमेल नहीं होगा, तो सभी अलग-अलग बातें करेंगे। ऐसी स्थिति में पुलिस के पास सिर्फ लाठीचार्ज की चेतावनी देने का ही विकल्प बचता है। संवेदनशील एरिया से भीड़ को रखें दूर उन्होंने सुझाव दिया कि अस्पताल में भीड़ को लेबर रूम, बच्चों के वार्ड और ऑपरेशन थिएटर जैसे संवेदनशील इलाकों से दूर रखा जाए। एंट्री और एग्जिट के रास्ते अलग-अलग हों और एआई बेस्ड सीसीटीवी कैमरों से भीड़ की संख्या पर नजर रखी जाए। कलेक्टर ने कहा कि भीड़ में से कुछ प्रभावशाली लोगों को चिन्हित कर उनसे अलग से बात करनी चाहिए। इससे पूरी भीड़ को कंट्रोल करने में मदद मिलती है। मीडिया से पहले बात करें, भीड़ बनने से पहले उन्होंने सलाह दी कि भीड़ जुटने से पहले मीडिया को इंटरव्यू देकर अपना पक्ष रखें। भीड़ अचानक नहीं बनती, लोग एक-दूसरे को फोन करके सूचना देते हैं। ऐसे में समय रहते मीडिया के जरिए सही जानकारी देने से हालात संभल सकते हैं।

कलेक्टर ने दिए 'मरीज के मरने पर क्राउड मैनेजमेंट टिप्स':कहा- भीड़ को टेक्निकल ज्ञान न दें; डॉक्टर-प्रशासन-पुलिस में तालमेल बना रहे
खंडवा मेडिकल कॉलेज में फॉरेंसिक मेडिसिन एंड साइंस पर आयोजित अंतर्राष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस के दौरान 2014 बैच के आईएएस और खंडवा कलेक्टर ऋषव गुप्ता ने मेडिकल स्टूडेंट्स और डॉक्टर्स को क्राउड मैनेजमेंट पर अहम सुझाव दिए। उन्होंने कहा कि मरीज की मौत के बाद अस्पतालों में बनने वाली तनावपूर्ण स्थिति को संभालने के लिए डॉक्टरों को पहले से मानसिक और प्रशासनिक तैयारी रखनी चाहिए। मरीज की मौत पर डॉक्टरों पर लगते हैं आरोप कलेक्टर ऋषव गुप्ता ने कहा कि जब किसी मरीज की मौत होती है, तो सबसे पहले डॉक्टरों पर लापरवाही के आरोप लगते हैं। इसके बाद आक्रोशित भीड़ अस्पताल में इकट्ठा हो जाती है। इस भीड़ में एक व्यक्ति आपसे बात करता है, लेकिन वह उस समय लॉजिक से नहीं सोचता। लॉजिक नहीं, भीड़ की साइकोलॉजी समझनी होगी उन्होंने कहा कि सामने खड़ा व्यक्ति मरीज का परिजन होता है, उसके साथ भीड़ भी होती है। ऐसे में डॉक्टरों को पहले उसकी मानसिक स्थिति को समझना पड़ेगा। वह भावनात्मक रूप से टूट चुका होता है, इसलिए उसे सिर्फ तर्क से नहीं समझाया जा सकता। टेक्निकल भाषा भीड़ को और उग्र करती है कलेक्टर ने बताया कि अक्सर डॉक्टर वहीं भाषा भीड़ से बोलने लगते हैं, जो वे आपस में बोलते हैं। मेडिकल टर्म्स का इस्तेमाल करने से भीड़ को लगता है कि डॉक्टर उसे अनपढ़ समझ रहा है, जिससे गुस्सा और बढ़ जाता है। हर जगह डॉक्टर की भाषा काम नहीं करती उन्होंने कहा कि डॉक्टर भीड़ से कहते हैं कि मरीज को फलां बीमारी थी, हमने पूरा प्रयास किया, लेकिन हर जगह और हर समय टेक्निकल भाषा नहीं चलती। ऐसे समय में लोगों के इमोशन हावी होते हैं और उन्हें संवेदनशील तरीके से समझाना जरूरी होता है। पहले से रखें तैयारी, प्रशासन को समय पर सूचना दें कलेक्टर ऋषव गुप्ता ने कहा कि अगर मरीज की हालत गंभीर है और मौत की आशंका है, तो पहले से तैयारी रखें। लोकल मजिस्ट्रेट और पुलिस के नंबर डॉक्टरों के पास होने चाहिए और समय रहते उन्हें सूचना देना जरूरी है। रिकॉर्ड दिखाने नहीं, जवाब सुनने आती है भीड़ उन्होंने कहा कि डॉक्टर सोचते हैं कि रिकॉर्ड दिखाकर सब समझा देंगे, लेकिन भीड़ रिकॉर्ड देखने नहीं आती। मरीज की मौत के बाद पहला आधा या एक घंटा सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होता है, जिसमें स्थिति को संभाला जा सकता है। समन्वय न हो तो पुलिस सिर्फ डंडा दिखाती है कलेक्टर ने कहा कि अगर डॉक्टर, मजिस्ट्रेट और पुलिस के बीच तालमेल नहीं होगा, तो सभी अलग-अलग बातें करेंगे। ऐसी स्थिति में पुलिस के पास सिर्फ लाठीचार्ज की चेतावनी देने का ही विकल्प बचता है। संवेदनशील एरिया से भीड़ को रखें दूर उन्होंने सुझाव दिया कि अस्पताल में भीड़ को लेबर रूम, बच्चों के वार्ड और ऑपरेशन थिएटर जैसे संवेदनशील इलाकों से दूर रखा जाए। एंट्री और एग्जिट के रास्ते अलग-अलग हों और एआई बेस्ड सीसीटीवी कैमरों से भीड़ की संख्या पर नजर रखी जाए। कलेक्टर ने कहा कि भीड़ में से कुछ प्रभावशाली लोगों को चिन्हित कर उनसे अलग से बात करनी चाहिए। इससे पूरी भीड़ को कंट्रोल करने में मदद मिलती है। मीडिया से पहले बात करें, भीड़ बनने से पहले उन्होंने सलाह दी कि भीड़ जुटने से पहले मीडिया को इंटरव्यू देकर अपना पक्ष रखें। भीड़ अचानक नहीं बनती, लोग एक-दूसरे को फोन करके सूचना देते हैं। ऐसे में समय रहते मीडिया के जरिए सही जानकारी देने से हालात संभल सकते हैं।