रीवा रियासत का ऐतिहासिक शिकारगाह जर्जर:छुहिया घाटी का 150 साल पुराना भवन की दीवारों में टूट-फूट; संरक्षण की मांग
रीवा रियासत का ऐतिहासिक शिकारगाह जर्जर:छुहिया घाटी का 150 साल पुराना भवन की दीवारों में टूट-फूट; संरक्षण की मांग
रीवा और सीधी जिले की सीमा पर स्थित छुहिया घाटी का ऐतिहासिक शिकारगाह रखरखाव के अभाव में जर्जर हो रहा है। रीवा रियासत के राजाओं से जुड़ी इस पुरानी कोठी के कई हिस्से क्षतिग्रस्त हैं। स्थानीय लोगों और इतिहास प्रेमियों ने धरोहर के संरक्षण और क्षेत्र को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की मांग की है। रीवा रियासत के समय हुआ था निर्माण जानकारों के अनुसार, पहाड़ी की ऊंचाई पर स्थित इस भवन का निर्माण रीवा रियासत के शासनकाल में कराया गया था। ऐतिहासिक अभिलेखों के मुताबिक, निर्माण कार्य महाराज व्यंकट रमण सिंह जूदेव के समय शुरू हुआ था। बाद में महाराजा गुलाब सिंह जूदेव के शासनकाल में इसका विस्तार और निर्माण आगे बढ़ाया गया। ऊंचाई पर बने होने के कारण यहां से छुहिया घाटी, जंगल और आसपास का क्षेत्र दूर तक दिखाई देता है। राजसी दौर में इसका इस्तेमाल शिकार, विश्राम और वन क्षेत्र की निगरानी के लिए किया जाता था। दीवारों में टूट-फूट के निशान समय के साथ भवन की स्थिति खराब होती गई। इसके कई हिस्से क्षतिग्रस्त हो चुके हैं और दीवारों व अंदरूनी हिस्सों में तोड़फोड़ के निशान दिखाई देते हैं। हालांकि, पत्थरों से बनी मूल संरचना अब भी इसकी पुरानी वास्तुकला और मजबूती की झलक देती है। स्थानीय लोगों के अनुसार, शिकारगाह के नीचे वन विभाग की चौकी है और पूरा क्षेत्र वन क्षेत्र में आता है। लोगों ने मांग की है कि ऐतिहासिक भवन का संरक्षण कर इसे पर्यटन की दृष्टि से विकसित किया जाए। वन विभाग कर रहा निगरानी सीधी वन मंडल की डीएफओ प्रीती अहिरवार ने बताया कि शिकारगाह रीवा-सीधी सीमा पर स्थित करीब 150 वर्ष पुराना ऐतिहासिक भवन है। उन्होंने कहा कि इसके रखरखाव के लिए अलग से किसी अतिरिक्त खर्च की आवश्यकता नहीं पड़ती। वन विभाग की टीम लगातार इसकी निगरानी कर रही है, ताकि कोई व्यक्ति ऐतिहासिक धरोहर को नुकसान न पहुंचा सके। उन्होंने कहा कि विभाग का प्रयास है कि भवन सुरक्षित रहे और इसकी ऐतिहासिक पहचान भविष्य में भी बरकरार रहे।
रीवा और सीधी जिले की सीमा पर स्थित छुहिया घाटी का ऐतिहासिक शिकारगाह रखरखाव के अभाव में जर्जर हो रहा है। रीवा रियासत के राजाओं से जुड़ी इस पुरानी कोठी के कई हिस्से क्षतिग्रस्त हैं। स्थानीय लोगों और इतिहास प्रेमियों ने धरोहर के संरक्षण और क्षेत्र को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की मांग की है। रीवा रियासत के समय हुआ था निर्माण जानकारों के अनुसार, पहाड़ी की ऊंचाई पर स्थित इस भवन का निर्माण रीवा रियासत के शासनकाल में कराया गया था। ऐतिहासिक अभिलेखों के मुताबिक, निर्माण कार्य महाराज व्यंकट रमण सिंह जूदेव के समय शुरू हुआ था। बाद में महाराजा गुलाब सिंह जूदेव के शासनकाल में इसका विस्तार और निर्माण आगे बढ़ाया गया। ऊंचाई पर बने होने के कारण यहां से छुहिया घाटी, जंगल और आसपास का क्षेत्र दूर तक दिखाई देता है। राजसी दौर में इसका इस्तेमाल शिकार, विश्राम और वन क्षेत्र की निगरानी के लिए किया जाता था। दीवारों में टूट-फूट के निशान समय के साथ भवन की स्थिति खराब होती गई। इसके कई हिस्से क्षतिग्रस्त हो चुके हैं और दीवारों व अंदरूनी हिस्सों में तोड़फोड़ के निशान दिखाई देते हैं। हालांकि, पत्थरों से बनी मूल संरचना अब भी इसकी पुरानी वास्तुकला और मजबूती की झलक देती है। स्थानीय लोगों के अनुसार, शिकारगाह के नीचे वन विभाग की चौकी है और पूरा क्षेत्र वन क्षेत्र में आता है। लोगों ने मांग की है कि ऐतिहासिक भवन का संरक्षण कर इसे पर्यटन की दृष्टि से विकसित किया जाए। वन विभाग कर रहा निगरानी सीधी वन मंडल की डीएफओ प्रीती अहिरवार ने बताया कि शिकारगाह रीवा-सीधी सीमा पर स्थित करीब 150 वर्ष पुराना ऐतिहासिक भवन है। उन्होंने कहा कि इसके रखरखाव के लिए अलग से किसी अतिरिक्त खर्च की आवश्यकता नहीं पड़ती। वन विभाग की टीम लगातार इसकी निगरानी कर रही है, ताकि कोई व्यक्ति ऐतिहासिक धरोहर को नुकसान न पहुंचा सके। उन्होंने कहा कि विभाग का प्रयास है कि भवन सुरक्षित रहे और इसकी ऐतिहासिक पहचान भविष्य में भी बरकरार रहे।